ആജ് കാ ശബ്ദ് നിസ്പൃഹ് സുമിത്രാനന്ദൻ പന്ത് കി കവിതാ ഐ മിട്ടി കേ ധലേ അഞ്ജൻ – അമർ ഉജാല കാവ്യ – ഇന്നത്തെ വാക്ക്: നിസ്പൃഹ്, സുമിത്രാനന്ദൻ പന്തിൻ്റെ കവിത

                
                                                         
                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- निस्पृह, जिसका अर्थ है- जिसे किसी प्रका का लोभ या कामना न हो, निर्लोभ। प्रस्तुत है सुमित्रानंदन पंत की कविता- ऐ मिट्टी के ढेले अनजान!
                                                                 
                            

ऐ मिट्टी के ढेले अनजान!
तू जड़ अथवा चेतना-प्राण?
क्या जड़ता-चेतनता समान,
निर्गुण, निसंग, निस्पृह, वितान?

कितने तृण, पौधे, मुकुल, सुमन,
संसृति के रूप-रंग मोहन,
ढीले कर तेरे जड़ बन्धन
आए औ’ गए! (यही क्या मन?)

अब हुआ स्वप्न मधु का जीवन,
विस्मृत-स्मृति के विमुक्त बन्धन!
खुल गया शून्यमय अवगुंठन
अज्ञेय सत्य तू जड़-चेतन!

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44 മിനിറ്റ് മുമ്പ്

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