अमर उजाला शब्द सम्मान 2025 का आयोजन नई दिल्ली के 15 जनपथ स्थित अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर के भीम सभागार में प्रख्यात सितार वादक उस्ताद शुजात हुसैन खान के आतिथ्य में संपन्न हुआ । कार्यक्रम में उस्ताद शुजात हुसैन खान ने अमर उजाला शब्द सम्मान के विजेताओं को अलंकृत किया।
कार्यक्रम की शुरूआत राष्ट्रगान के साथ हुई उसके बाद मंच पर मुख्य अतिथि और जूरी का पुष्प गुच्छ के साथ स्वागत किया गया। अमर उजाला समूह के समूह सलाहकार यशवंत व्यास ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा, रूहों को जोड़ने और शाम को हल्का मूड देने के लिए आपका स्वागत है। अमर उजाला शब्द सम्मान की यह सातवीं कड़ी है। सूरज का सातवां घोड़ा। कई बार ऐसा लगता है कि हम लोग, हर आदमी सूरज की किरण को कहीं अपने तरीके से चुराकर अपने भीतर के एक तहखाने में रख लेता है और जब भी उसे एक उष्मा की जरूरत होती है, वह उसी किरण को उठाता है, उससे फिर अपनी जिंदगी को उर्जावान बनाता है।
इसके बाद अमर उजाला शब्द सम्मान के सर्वोच्च अलंकरण 'आकाशदीप' से हिंदी की प्रख्यात लेखिका ममता कालियाऔर मणिपुरी की विख्यात रचनाकार अरमबम ओंगबी मेमचौबी को सम्मानित किया गया।
अमर उजाला शब्द सम्मान 2025 अलंकरण की अन्य श्रेणियों में-
'छाप' (कविता) के लिए सविता सिंह को उनके कविता संग्रह ‘वासना एक नदी का नाम है’ के लिए सम्मानित किया गया।
'छाप' (कथेतर) सम्मान नाइश हसन को उनकी कृति ‘मुताह’ के लिए पुरस्कृत किया गया।
'छाप' (कथा) के लिए शहादत को उनके संग्रह ‘कर्फ्यू की रात’ के लिए यह सम्मान दिया गया।
मनीष यादव को उनकी पहली किताब 'सुधारगृह की मालकिनें' के लिए 'थाप' श्रेष्ठ कृति सम्मान से सम्मानित किया गया।
आज शब्द पर सबसे बड़ा संकट: ममता कालिया
पुरस्कार वितरण के बाद विख्यात कथाकार ममता कालिया ने अपने संबोधन में कहा, 'आकाशदीप सम्मान की प्रतिष्ठा से मैं भलीभांति अवगत हूं, क्योंकि मुझसे पहले और श्रेष्ठ रचनाकारों को दिया जा चुका है। सबसे अच्छी बात है कि इस पूरे समारोह को जो नाम 'शब्द सम्मान' दिया गया है। मैं लगातार यह सोच रही थी कि आज सबसे बड़ा संकट शब्द पर ही आया हुआ है। शब्द की शक्ति कम होती जा रही है। चिह्नों और ध्वनियों की शक्ति बढ़ती जा रही है। 'शब्द सम्मान' में सबसे बड़ी चीज यह है कि आप शब्द के प्रति सचेत, सजग और संवेदनशील बन रहे हैं।'
आगे उन्होंने कहा- 'साहित्य से परिवर्तन बहुत धीमे-धीमे आता है। साहित्य का परिवर्तन और असर हम उस तरीके से नहीं देख सकते, जैसे दवाओं का असर हमारे शरीर पर होता है। तुरंत पता चल जाता है कि बुखार नीचे आ गया है। साहित्य में बुखार ठीक करने के लिए कई सदियां लग जाती हैं। साहित्यकार का प्रयत्न यही रहता है कि वह किसी तरीके से एक बेहतर समाज की रचना करे। देखिए हम लोग तो कहानी लिखने वाले लोग हैं। कहानी कभी बन जाती है, कभी बिगड़ जाती है। लेखक को पता रहता है कि इसमें गांठ कहां पड़ गई, कहां यह थोड़ी ढीली है। आलोचक को देर में पता चलता है। जब आलोचक को पता चल जाता है, तब असली विचारों का मंथन होता है। अमर उजाला एकमात्र ऐसा अखबार है, जिसमें अभी साहित्य के लिए जगह है।'
'मेरी प्यारी पहाड़ी माँ' का पाठ
मणिपुरी भाषा में अभूतपूर्व योगदान देने के लिए आकाशदीप 2025 से सम्मानित विख्यात रचनाकार अरमबम ओंगबी मेमचौबी ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा, मैं हिंदी थोड़ा जानती हूं लेकिन हिंदी फिल्में देखती रही हूँ और साहिर लुधियानवी व शकील बदायूंनी को बहुत पसंद करती हूं। फिल्में बहुत पसंद है। एक अनुदित कविता सुनाऊंगी जिसे अर्जुन निराला से अनुवाद किया। उन्होंने कविता 'मेरी प्यारी पहाड़ी मां' का मणिपुरी भाषा में पाठ किया। हिंदी में कविता इस तरह है-
मेरी प्यारी माँ
पहाड़ों के मुखिया की बेटी
पेड़ों सी और जंगलों सी शांत
ऊंची पर्वतमालाओं सी गंभीर
धीरज की मूर्ति
मेरी प्यारी पहाड़ी माँ
सावधानी से सिर पर आँचल साधे
कमर कसकर नंगे पाँव चलती हुई
कठोर पर्वती ढलानों को पार करती हुई
पीठ पर भारी टोकरी उठाए
धीरे-धीरे धीरे धीरे
चढ़ती जाती है पहाड़ की पर
लंबी अंतहीन पहाड़िंयों को लांघती
शांत पहाड़ी धारा से जल भरती
दूर थकाऊनुमा सीढ़ी से उतरती हुई
खेतों में जल भरती
खेत के कोने तक मिट्टी को खोदती हुई
होई होई
जंगली सुअरों और बंदरों को भगाती
खोई की गूँज के साथ ऊपर बढ़ती जाती है
राहत की गहरी साँस लेते हुए
माथे से पसीना पोंछते हुए
मेरी प्यारी पहाड़ी माँ
एक दिन मैंने उससे पूछा
मेरी प्यारी पहाड़ी माँ !
पीठ की टोकरी में क्या रखा है तुमने
माँ एक बार दिखाओ तो
माँ ने बिना उतारे बोझ
एक तरफ झुकते हुए टोकरी में जो था
दिखा दिया
मैंने उत्सुकता से देखा
उसका वृद्ध पति
ओह !
भीतर पाया उसका वृद्ध पति
और उसका युवा पुत्र
मैंने विस्मय से पूछा
ये क्या है माँ
मां ने मुझे एक बार देखा
फिर शांत स्वर में बोली
यदि मैं न उठाऊं इन्हें
तो ये जीवित रहेंगे
और फिर बिना कुछ कहे वो चल पड़ी
जैसे वो चलती है
शांत, गंभीर
मेरी प्यारी पहाड़ी माँ
सात सुरों से मिलकर बनता है संगीत और उसमें जब शब्दों की चेतना जुड़ जाती है, तो वे सीधे दिलों को जोड़ती है। बुधवार की शाम अमर उजाला शब्द सम्मान समारोह में यही अद्भुत संगम देखने को मिला। इस अलंकरण समारोह में पहले शब्द साधकों का सम्मान हुआ, फिर सुरों के साधक उस्ताद शुजात हुसैन खान ने अपनी सितार और गायकी से सबके मन को मोह लिया। शब्द साधना के मंच पर उस्ताद जब बैठे, तो लगा कि वे सिर्फ सितार के तारों को छेड़ेंगे, लेकिन उन्होंने सितार के साथ-साथ अपनी गायकी से भी परिचय कराया।
सांस्कृतिक संध्या की शुरूआत में उस्ताद शुजात हुसैन खान ने भगवान शंकर पर लिखी गई बंदिश 'दर्शन देहो शंकर महादेव' को न केवल गाया, बल्कि बंदिश के सुरों को सितार के तारों में पिरोया भी और संगत में तबले और ढोल की थाप से सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। कार्यक्रम में तबले की थाप और सितार के सुरों से जो धाराएं निकलीं और संगीत की नदी में एक हो गईं। उस्ताद इमदादखानी घराने से आते हैं। सितार का गायकी अंग उस्ताद के वादन की खूबी है। मौसीकी की यह घरानेदार खूबी उन्हें अपने वालिद और गुरु उस्ताद विलायत खान से मिली
उस्ताद शुजात हुसैन खान ने कृष्ण बिहारी नूर की ग़ज़ल 'ज़िंदगी से बड़ी सजा ही नहीं, क्या जुर्म है पता ही नहीं', शबीना अदीब की ग़ज़ल- जो खानदानी रईस हैं वो मिजाज रखते हैं नर्म अपना गाया। फिर एक के बाद एक- फिर चली बाद ए सबा फूलों का मौसम आ गया, रात कटती नहीं दिन गुरता नहीं, हाय ज़िंदगी क्या से क्या हो गई, मयकदे में वो बेपर्दा क्या आ गये, सहित भगवान कृष्ण पर आधारित जावेद अख़्तर का लिखा हुआ भजन- ओ, पालनहारे, निर्गुण और न्यारे, छाप तिलक सब छीनी...जैसे कितने गीत गाये। क्या ग़ज़ल, क्या शे'र, क्या भजन, क्या सूफ़ी गीत... आज शाम ऐसा कुछ नहीं बचा जो उस्ताद शुजात हुसैन की सितार और उनकी गायकी से न निकला हो। खचाखच भरे सभागार में दर्शक झूम उठे और जमकर तालियां बजाईं।
कार्यक्रम के अंत में अमर उजाला समूह के चेयरमैन राजुल माहेश्वरी जी ने उस्ताद शुजात हुसैन खान को स्मृति चिन्ह भेंट करते हुए सबका आभार प्रकट किया।
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आज शब्द पर सबसे बड़ा संकट: ममता कालिया
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